लूट का माल

(Loot Ka Maal)

फ़ुलवा

हरजीत सिंह ज्यों ही कमरे में दाखिल हुआ, सन्तो पलंग पर से उठी। अपनी तेज-तर्रार आँखों से उसकी तरफ घूरकर देखा और दरवाजे की कुण्डी बन्द कर दी। रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे। शहर का वातावरण एक अजीब रहस्यमयी खामोशी के आगोश में था।

सन्तो पलंग पर पालथी मारकर बैठ गई। हरजीत सिंह, जो शायद अपने समस्यापूर्ण विचारों के उलझे हुए धागे खोल रहा था, हाथ में कृपाण लेकर एक कोने में खड़ा था। कुछ पल इसी तरह खामोशी में बीत गये। सन्तो को थोड़ी देर के बाद अपना आसन पसन्द न आया और दोनों टाँगें पलंग के नीचे लटकाकर उन्हें हिलाने लगी।

हरजीत सिंह फिर भी कुछ न बोला।

सन्तो भरे-भरे हाथ-पैरों वाली औरत थी। चौड़े-चकले चूतड़ों वाली थुल-थुल गोश्त से भरी पूरी। कुछ बहुत ही ज्यादा ऊपर को उठा हुआ वक्ष, तेज आँखें, चेहरे की बनावट से पता चलता था कि बड़े धड़ल्लेदार औरत है।

हरजीत सिंह सिर नीचा किये एक कोने में चुपचाप खड़ा था। सिर पर उसके कसकर बाँधी हुई पगड़ी ढीली हो रही थी। उसने हाथ में जो कृपाण पकड़ी हुई थी, उसमें थोड़ी-थोड़ी कम्पन थी, उसके आकार-प्रकार और डील-डौल से पता चलता था कि वह सन्तो जैसी औरत के लिए सर्वोपयुक्त मर्द है।

कुछ क्षण जब इसी तरह खामोशी में बीत गये तो सन्तो छलक पड़ी, लेकिन तेज-तेज आँखों को नचाकर वह सिर्फ इस कदर कह सकी- हर्जीतसिहां !

हरजीत सिंह ने गर्दन उठाकर सन्तो की तरफ देखा, मगर उसकी निगाहों की गोलियों की ताब न लाकर मुँह दूसरी तरफ मोड़ लिया।

सन्तो चिल्लाई- हरजीत सिंह !

लेकिन फौरन ही आवाज भींच ली, पलंग पर से उठकर उसकी तरफ होती हुई बोली- कित्थे गायब रये ऐन्ने दिन?

हरजीत सिंह ने खुश्क होठों पर जबान फेरी- मैन्नू नी पता।

सन्तो भन्ना गई- मा यव्या ! ऐ वी कोई जवाब होया !

हरजीत सिंह ने कृपाण एक तरफ रख दी और पलंग पर लेट गया। ऐसा लग रहा था कि वह कई दिनों का बीमार है।

सन्तो ने पलंग की तरफ देखा, जो अब हरजीत सिंह से लदा था, उसके दिल में हमदर्दी पैदा हो गई तो उसके माथे पर हाथ रखकर उसने बड़े प्यार से पूछा- यारा ! कि होया त्वानूँ?

हरजीत सिंह छत की तरफ देख रहा था। उससे निगाहें हटाकर उसने सन्तो ने परिचित चेहरे की टटोलना शुरू किया- सतवन्त !

आवाज में दर्द था। सन्तो सारी की सारी सिमटकर अपने ऊपरी होंठ में आ गई- बोल जाण।

कहकर वह उसको दाँतों से काटने लगी।

हरजीत सिंह ने पगड़ी उतार दी। सन्तो की तरफ सहारा लेने वाली निगाहों से देखा। उसके गोश्त भरे कूल्हे पर जोर से थप्पा मारा और सिर को झटका देकर अपने आपसे कहा- एस कुड़ी दा दिमांग ई खराब ऐ।

झटके देने से उसके बाल खुल गये। सन्तो उंगलियों से उनमें कंघी सी करने लगी। ऐसा करते हुए उसने बड़े प्यार से पूछा- सिंहा, कित्थे रये ऐन्ने दिन?

”भूरे दी मां दे घर !” हरजीत सिंह ने सन्तो को घूरकर देखा और फौरन दोनों हाथों से उसके उभरे हुए सीने को मसलने लगा- कसम नाल ! वड्डी जानदार जनान्नी ऐ तूँ !

सन्तो ने एक अदा के साथ हरजीत सिंह के हाथ एक तरफ झटक दिये और पूछा- तवाणूँ मेरी सौं, दस्सो कित्थे रये ? शहर गये सी?”

हरजीत सिंह ने एक ही लपेट में अपने बालों का जूड़ा बनाते हुए जवाब दिया- ना !

सन्तो चिढ़ कर बोली- छूठ ! तूँ पक्का शहर गया होणा ते बोह्ता माल लुट्या होणा, मेर तों लुका रह्या ऐ !

” जे मैं छूठ बोल्लां, मैं अपणे प्यो दा णी !”

सन्तो थोड़ी देर के लिए चुप रही लेकिन फौरन ही भड़क कर बोली- फ़ेर मैन्नू ऐ दस्स ! ओस्स रात तैन्नू कि होया सी? भला चंगा मेरे णाल पया सी, ओ सारे जेवर तूँ मैन्नू पा रक्खे सी जेहड़े तूँ शहरों लुट्ट के ल्याया सी। मेरियाँ पप्पियाँ लै रया सी। फ़ेर तैन्नू की होया के इक्कदम उठके लत्ते पैहन के बाह्र भज ग्या।

हरजीत सिंह का रंग पीला पड़ गया। सन्तो ने यह तबदीली देखते ही कहा- वेख्या किंवें रंग सरोंफ़ुल्ला पै गया सियाँ, कसम नाल, कुह ते झोल हैगा।

”तेरी सौं, कुझ वी नी !”

हरजीत सिंह की आवाज बेजान थी। सन्तो का शक और ज्यादा पक्का हो गया। होंठ भींचकर उसने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा- हर्जित्ता, की गल्ल ऐ, तूं ते अट्ठ दिनां विच बदल गया लगदा ऐं !

हरजीत सिंह एकदम उठ बैठा, जैसे किसी ने उस पर हमला किया था। सन्तो को अपने मजबूत बाजुओं में समेटकर उसने पूरी ताकत के साथ झिंझोड़ना शुरू कर दिया- जानी, मैं ओई याँ ! घुट-घुट कर पा जफ्फियाँ, हुण्णे कडदाँ तेरे हड्डाँ दी गर्मी।

सन्तो ने कोई विरोध नहीं किया लेकिन वह शिकायत करती रही- होया की सी तैन्नू ओस्स रात?

”भूरे दी मां दा ओ हो गया सी !”

”ते मैंनू नईं दस्सोगे?”

”कोई गल्ल होवे ताँ दस्साँ !”

”मैंनू अपने हत्थाँ नाल फ़ूक्को जे झूठ बोल्लो।”

हरजीत सिंह ने अपने बाजू उसकी गर्दन में डाल दिये और होंठ उसके होंठ पर गड़ा दिए। मूँछों के बाल सन्तो के नथुनों में घुसे, तो उसे छींक आ गई। हरजीत सिंह ने सन्तो को वासनामयी नजरों से देखकर कहा- आजा याराँ, इक वारी !

सन्तो ने एक अदा के साथ उसने अपनी आँखों की पुतलियाँ घुमाई, कहा- चल, दफा हो।

हरजीत सिंह ने उसके भरे हुए कूल्हे पर जोर से चुटकी भरी, सन्तो तड़पकर एक तरफ हट गई, ”न कर हरजितसियाँ, दर्द हुन्दा !

हरजीत सिंह ने आगे बढ़कर सन्तो की ऊपरी होंठ अपने दाँतों तले दबा लिया और कचकचाने लगा। सन्तो एकदम पिघल गई।

हरजीत सिंह ने अपना कुर्ता उतारकर फेंक दिया और कहा- ते फ़ेर हो जे इक्क वाजी?

सन्तो के होंठ कँपकँपाने लगा। हरजीत सिंह ने दोनों हाथों से सन्तो की कमीज पकड़ी और जिस तरह बकरे की खाल उतारते हैं, उसी तरह उसको उतारकर एक तरफ रख दिया, फिर उसने घूरकर उसके नंगे बदन को देखा और जोर से उसके बाजू पर चुटकी भरते हुए कहा- सन्तो, कसम नाल ! बड़ी करारी जन्नानी ऐ तूँ।

सन्तो अपने बाजू पर उभरते हुए धब्बे को देखने लगी- बड़ा जालिम ऐ तू सियाँ।

हरजीत सिंह अपनी घनी काली मूँछों में मुस्काया- होण दे अज्ज जालिम।

और यह कहकर उसने और जुल्म ढाने शुरू किये, सन्तो का ऊपरी होंठ दाँतों तले किचकिचाया, कान की लवों को काटा, उभरे हुए सीने को भँभोड़ा, भरे हुए कूल्हों पर आवाज पैदा करने वाले चाँटे मारे, गालों के मुँह भर भर कर बोसे लिये, चूस-चूसकर उसका सीना थूकों से लथेड़ दिया।

सन्तो तेज आँच पर चढ़ी हुई हांडी की तरह उबलने लगी। लेकिन हरजीत सिंह उन तमाम हीलों के बावजूद खुद में हरकत पैदा न कर सका। जितने गुर और जितने दाँव उसे याद थे, सबके-सब उसने पिट जाने वाले पहलवान की तरह इस्तेमाल कर दिये,परन्तु कोई कारगर न हुआ।

सन्तो के सारे बदन के तार तनकर खुद-ब-खुद बज रहे थे, गैरजरूरी छेड़-छाड़ से तंग आकर कहा- सियाँ, बहोत फेंट चुका, हुण्ण अग्गे वद !

यह सुनते ही हरजीत सिंह जैसे पानी पानी हो गया, हाँफता हुआ वह सतवन्त के पहलू में लेट गया और उसके माथे पर सर्द पसीने चूने लगे।

सन्तो ने उसे गरमाने की बहुत कोशिश की, मगर नाकाम रही। अब तक सब कुछ मुँह से कहे बगैर होता रहा था, लेकिन जब सन्तो के अंगों को कड़ी निराशा हुई तो वह झल्ला कर पलंग से उतर गई।

सामने खूँटी पर चादर पड़ी थी, उसे उतारकर उसने जल्दी-जल्दी ओढ़कर और नथुने फुलाकर बिफरे हुए लहजे में कहा- सरदारया, औ केहड़ी हरामजादी ऐ, जिहदे कोल तूँ ईन्ने दिन रहके आया ते जिन्ने तैन्नू निचोड़ छड्ड्या?

हरजीत सिंह ने थके हुए लहजे में कहा- कोई वी नी ! सतवन्त, कोई वी नी।

सन्तो ने अपने उभरे हुए कूल्हों पर हाथ रखकर एक दृढ़ता के साथ कहा- ”हरजित्तया ! मैं अज्ज झूठ-सच पुच्छ के रवांगी, खा सौं?”

हरजीत सिंह ने कुछ कहना चाहा, मगर सन्तो ने इसकी इजाजत न दी- सौं लैण तों पह्ल्लाँ सोच लयीं ! मैं सरदार अजमेर सिंह दी धी आँ !

हरजीत सिंह ने बड़े दु:ख के साथ हाँ में सिर हिलाया। सन्तो बिल्कुल पगला गई, लपककर कृपाण उठाई, म्यान को केले के छिलके की तरह उतारकर एक तरफ फेंका और हरजीत सिंह की जांघ पर वार कर दिया। लहू के फव्वारे छूट पड़े।

सन्तो को इससे भी तसल्ली न हुई तो उसने वहशी बिल्लियों की तरह हरजीत सिंह के केश नोचने शुरू कर दिये। साथ-ही-साथ वह अपनी नामालूम सौत को मोटी-मोटी गालियाँ देती रही। हरजीत सिंह ने थोड़ी देर बाद दुबली आवांज में विनती की, ”जाने दे अब सतवन्त, जाने दे।”

आवाज में बला का दर्द था। सन्तो पीछे हट गई।

सन्तो की ईष्या फिर भड़की- ओ है कौण? तेरी मां?

हरजीत सिंह की आँखें धुँधला रही थीं। एक हल्की-सी चमक उनमें पैदा हुई और उसने सन्तो से कहा, ”गाली न दे।”

और जब वह बताने लगा तो उसके माथे पर ठंडे पसीने के लेप होने लगे- सतवन्त ! शहर विच लूट होई ते सारे गहने-रुपये-पैसे मैं तैन्नू दे दित्ते, इक्क गल्ल नई दस्सी।

हरजीत सिंह ने घाव में दर्द महसूस किया और कराहने लगा। सन्तो ने उसकी तरफ तवज्जो न दी और बड़ी बेरहमी से पूछा, ”केड़ी गल्ल?”

हरजीत सिंह ने कहा- जेस्स घर ते मैं धावा बोल्या सी था…ओत्थे सत्त बन्दे सी, छे मैं कत्ल कर दित्ते…ऐस्सी किरपान नाल, सतवीं इक्क बोहत सोहणी कुड़ी सी, मैं ओन्नू चुक्क के लै आय्या।

सन्तो खामोश सुनती रही।

हरजीत सिंह ने कहा- ‘ओ ऐन्नी सोहणी सी के मेर तों नईं रया गया !

सन्तो ने सिर्फ इस कदर कहा, ”हूं।”

” मैं ओन्नू मोड्डे ते पाके टुर पया… रस्ते विच…नहर दी पटरी उत्ते, झाड़ियाँ विच्च मैं ओन्नू थल्ले पाया।

सतवन्त ने थूक निकलकर हलक तर किया और पूछा- फ़ेर की होया?

हरजीत सिंह के हलक से मुश्किल से ये शब्द निकले- मैं ओन्नू नंगी किता ते अपणे कप्ड़े लाण लगया ते ओन्ने मेरी किरपान चुक्क लई… ते… !

उसकी आवाज डूब गयी।

सन्तो ने उसे झिंझोड़ा- फ़ेर?

हरजीत सिंह ने अपनी बन्द होती आँखें खोलीं और सन्तो के जिस्म की तरफ देखा- ओन्ने किरपान अपने गले ते फ़ेर लित्ती !

खत्म !



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